शांति नहीं, विनाश का ‘नोबेल’: क्या ट्रंप की नीतियां दुनिया को महाविनाश की ओर धकेल रही हैं?

इतिहास गवाह है कि जब-जब कोई महाशक्ति अपनी खोती हुई साख को बचाने के लिए युद्ध का सहारा लेती है, तब-तब दुनिया का भूगोल और भविष्य दोनों बदल जाते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरा अमेरिका, जो कभी वैश्विक व्यवस्था का रक्षक माना जाता था, आज विवादों के केंद्र में है।

“The Price of Greatness is Responsibility” – विंस्टन चर्चिल, यूके प्रधानमंत्री (1960)

लेकिन क्या आज का अमेरिका उस जिम्मेदारी को निभा रहा है? या फिर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में वह अपने ही बनाए ‘ग्लोबल ऑर्डर’ को ध्वस्त कर रहा है?

महाशक्ति का उदय और पतन का डर

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका एक वैश्विक शक्ति बनकर उभरा। अगले पांच दशकों तक सोवियत संघ के साथ चले ‘शीत युद्ध’ ने दुनिया को दो ध्रुवों में बाँट दिया, लेकिन 1992 में रूस के विघटन के बाद अमेरिका ‘एकमात्र महाशक्ति’ बन गया। एशिया में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अमेरिका ने कई देशों में अपनी कठपुतली सरकारें बनाईं और अप्रत्यक्ष रूप से वहां के तेल और खनिज संसाधनों पर कब्जा कर लिया। लेकिन आज, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौर में, ऐसा लगता है कि अमेरिका अपनी खोई हुई साख को वापस पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, चाहे इसके लिए उसे ‘कॉन्फ्लिक्ट एंड वॉर नोबेल प्राइज’ ही क्यों न मिल जाए।

सीरिया, इराक, लेबनान और जॉर्डन में लाखों मासूमों की मौत हो या दशकों तक अरबों डॉलर खर्च करने के बाद अफगानिस्तान से अमेरिका की शर्मनाक विदाई, इन सबने वाशिंगटन के दबदबे पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

गाजा का संकट और दोहरी नीति

वर्तमान में इजरायल द्वारा गाजा में किए जा रहे हमलों में अमेरिका की भूमिका सबसे अधिक विवादास्पद रही है। 3 साल से चल रहे युद्ध में 70 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं, जिनमें 30,000 से अधिक मासूम बच्चे मारे जा चुके हैं। इसके बावजूद, अमेरिका द्वारा इजरायल को हथियारों की सप्लाई और संयुक्त राष्ट्र में वीटो पावर का इस्तेमाल करना उसकी ‘मानवतावादी’ छवि को तार-तार कर रहा है।

 “जहाँ बड़ी शक्ति होती है, वहाँ बड़ी जिम्मेदारी भी होती है।” – विंस्टन चर्चिल (ब्रिटिश प्रधानमंत्री)

विडंबना यह है कि 1945 में जिस UN की स्थापना दुनिया में संतुलन बनाए रखने के लिए हुई थी, आज उसी के 5 वीटो पावर वाले देश आपस में उलझे हुए हैं। हाल ही में कनाडा के प्रधानमंत्री ने भी स्वीकार किया कि अमेरिका अब पहले जैसा सुपरपावर नहीं रहा।

ईरान पर हमला: नियंत्रण या तबाही?

एशिया में चीन के बढ़ते वर्चस्व ने अमेरिका की नींद उड़ा दी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ईरान के सर्वोच्च नेता को खत्म करके अमेरिका मध्य पूर्व पर फिर से पूर्ण नियंत्रण पा सकेगा?

•  ट्रंप की नीति: डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का उद्देश्य अमेरिकी हितों को किसी भी कीमत पर सर्वोपरि रखना है। ईरान पर हमला करना इस नीति का एक हिस्सा हो सकता है ताकि मध्य पूर्व के तेल संसाधनों पर पकड़ मजबूत की जा सके।

•   सत्ता का संतुलन: विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व पर हमला करने से अमेरिका को शक्ति वापस नहीं मिलेगी, बल्कि इससे पूरा मध्य पूर्व एक अंतहीन युद्ध की आग में झुलस जाएगा।

वैश्विक व्यवस्था का विनाश?

अमेरिका अपनी खोई हुई ताकत पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रहा है। लेकिन क्या एक देश का वर्चस्व पूरी दुनिया की शांति से बड़ा है? अगर अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानूनों और दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान नहीं करता, तो वह वैश्विक व्यवस्था को सुधार नहीं रहा, बल्कि उसे बर्बाद कर रहा है।

ईरान के सर्वोच्च नेता के खात्मे से केवल एक व्यक्ति का अंत होगा, लेकिन इससे पैदा होने वाली नफरत और अस्थिरता अमेरिका को कभी वह ‘पुराना गौरव’ वापस नहीं दिला पाएगी जिसकी उसे तलाश है।

सत्ता का संघर्ष और वैश्विक व्यवस्था का पतन

आज की वैश्विक राजनीति उस दोराहे पर खड़ी है जहाँ शांति केवल कागजों तक सीमित रह गई है और शक्ति का प्रदर्शन ही नया ‘कानून’ बन गया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जिस अमेरिका ने विंस्टन चर्चिल के ‘महान उत्तरदायित्व’ के सिद्धांत की आड़ में अपनी वैश्विक पैठ बनाई थी, आज वही ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत अपनी खोई हुई साख को युद्ध की आग में तलाश रहा है। 1992 में सोवियत संघ के विघटन के बाद एशिया और मध्य पूर्व के तेल व खनिज संसाधनों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने वाला अमेरिका अब चीन और रूस के उभरते गठबंधन से बौखलाया हुआ है। पिछले एक दशक में सीरिया से लेकर अफगानिस्तान तक की विफलताओं और हाल ही में गाजा में इजरायल को दिए गए ‘अंधाधुंध समर्थन’, जिसमें 30,000 से अधिक मासूम बच्चों की बलि चढ़ गई, ने वाशिंगटन के नैतिक आधार को ध्वस्त कर दिया है।

कनाडा के प्रधानमंत्री का यह बयान कि “अमेरिका अब पहले जैसा सुपरपावर नहीं रहा”, इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि वीटो पावर वाले देश ही आज वैश्विक संप्रभुता के सबसे बड़े भक्षक बन गए हैं। ऐसे में ईरान के सर्वोच्च नेता को निशाना बनाकर मध्य पूर्व पर पूर्ण नियंत्रण पाने की डोनाल्ड ट्रंप की संभावित रणनीति न केवल एक रणनीतिक भूल होगी, बल्कि यह दुनिया को ‘संघर्ष और युद्ध के नोबेल पुरस्कार’ की ओर धकेलने जैसा होगा। ईरान पर कोई भी हमला केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था की तबाही और एक नए, अधिक हिंसक युग का सूत्रपात साबित हो सकता है।

Leave a comment