ईरान के सुप्रीम लीडर के खात्मे के बाद, क्या अमेरिका मध्य पूर्व में अपना दबदबा वापस पा सकेगा?

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद पूरे एशियाई महाद्वीप में अफरा-तफरी का माहौल है। 27-28 फरवरी, 2026 की देर रात अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त एयरस्ट्राइक में ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत हो गई। इसके जवाब में ईरान ने सात देशों—इज़राइल, यूएई, सऊदी अरब, कुवैत, जॉर्डन, कतर और बहरीन में स्थित 14 अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले किए हैं।

इस भयंकर बमबारी में भारी जानमाल का नुकसान हुआ है। द ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी (HRANA) ने पुष्टि की है कि इस क्रैकडाउन और हवाई हमलों में 7,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और वह हज़ारों अन्य मामलों की जांच कर रही है। वहीं, ईरानी सरकार ने आधिकारिक तौर पर अब तक 3,000 से अधिक लोगों के मारे जाने की बात स्वीकारी है।

अमेरिका का अब तक का सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा

2025 में अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में वापसी के बाद ही यह साफ हो गया था कि अमेरिका ईरान पर किसी बड़े एक्शन की तैयारी में है, लेकिन वाशिंगटन बस एक सही वक्त के इंतज़ार में बैठा था।

ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस एनालिस्ट्स और मिलिट्री फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, अमेरिका ने पिछले कुछ दिनों में इस क्षेत्र में 120 से अधिक लड़ाकू विमान तैनात किए हैं। 2003 के इराक युद्ध के बाद से मध्य पूर्व में यह अमेरिकी वायु शक्ति का सबसे बड़ा जमावड़ा है।

इन तैनाती में E-3 सेंट्री एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (AWACS), F-35 स्टील्थ स्ट्राइक फाइटर्स, और F-22 एयर सुपीरियरिटी जेट्स के साथ-साथ F-15s और F-16s लड़ाकू विमान शामिल हैं। फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा यह स्पष्ट दिखाता है कि अमेरिका और यूरोप के बेस से उड़ान भरने वाले इन विमानों को भारी कार्गो एयरक्राफ्ट और एरियल रिफ्यूलिंग टैंकरों का सपोर्ट मिल रहा है। यह कोई रूटीन रोटेशन नहीं, बल्कि एक लंबी और सस्टेंड ऑपरेशनल प्लानिंग का हिस्सा था।

इज़राइल और अमेरिका ने ईरान पर हमले की प्लानिंग कैसे की?

यह हमला रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि यह मोसाद (Mossad) और सीआईए (CIA) के महीनों के संयुक्त खुफिया अभियानों का नतीजा था। इस ऑपरेशन को ‘डिकैपिटेशन स्ट्राइक’ (Decapitation Strike) की तर्ज पर डिजाइन किया गया था, जिसका उद्देश्य सीधे शीर्ष नेतृत्व को खत्म करना था।

हमले से पहले दोनों देशों ने सैटेलाइट इमेजरी, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और ईरान के भीतर मौजूद अपने ह्यूमन इंटेलिजेंस नेटवर्क के जरिए सुप्रीम लीडर के गुप्त बंकरों और उनकी आवाजाही को ट्रैक किया। सबसे पहले, साइबर अटैक के जरिए ईरान के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम (जैसे कि बावर-373 और रूसी S-300) को ‘ब्लाइंड’ किया गया। इसके तुरंत बाद, रडार की पकड़ में न आने वाले F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स ने इस प्रिसिजन स्ट्राइक को अंजाम दिया। यह पूरी तरह से एक सिंक्रोनाइज़्ड ऑपरेशन था जिसमें अमेरिकी AWACS विमान आसमान से पूरे मिडिल ईस्ट के एयरस्पेस की निगरानी कर रहे थे ताकि किसी भी ईरानी पलटवार को तुरंत रोका जा सके।

इज़राइल की रणनीति: मोदी के इज़राइल दौरे से तुरंत वापस लौटने के बाद ईरान पर हमला?

अगर इस पूरी घटना पर एक रणनीतिक और वैश्विक नजरिया डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि हमले की टाइमिंग कोई संयोग नहीं थी। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इज़राइल दौरे से सुरक्षित वापस लौटने के तुरंत बाद ही ईरान पर यह बड़ा हमला किया गया। यह इज़राइल की एक सोची-समझी कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक थी।

इज़राइल जानता है कि भारत के ईरान के साथ भी अच्छे संबंध हैं (विशेषकर चाबहार पोर्ट और ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में), लेकिन वह भारत जैसे शक्तिशाली देश को नाराज़ नहीं कर सकता था। पीएम मोदी की यात्रा के दौरान इज़राइल ने अपनी सुरक्षा चिंताओं को साझा तो किया, लेकिन हमले के सटीक समय को तब तक गुप्त रखा जब तक भारतीय प्रतिनिधिमंडल सुरक्षित एयरस्पेस से बाहर नहीं निकल गया।

इस कूटनीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि हमले के बाद भारत इज़राइल के खिलाफ कोई कड़ा कदम न उठाए या वैश्विक मंचों पर उसकी निंदा न करे। इज़राइल ने इस हमले को ‘प्री-एम्प्टिव सेल्फ डिफेंस’ के रूप में पेश किया है। परिणाम यह है कि भारत अब इस मामले में कूटनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए केवल “शांति और डी-एस्केलेशन” की अपील कर रहा है, जो इज़राइल की एक बड़ी कूटनीतिक जीत है।

वैश्विक बाज़ार और अन्य देशों पर प्रभाव: अगर ईरान ने  “Strait of Hormuz” बंद किया तो क्या होगा?

सुप्रीम लीडर की मौत के बाद ईरान के पास पीछे हटने का कोई कारण नहीं बचा है। ऐसे में कूटनीतिक और सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को ब्लॉक करने की संभावना अब केवल एक खोखली धमकी नहीं, बल्कि एक बेहद वास्तविक और खतरनाक रणनीति बन चुकी है। अगर ईरान सच में इस संकरे समुद्री रास्ते को चोक कर देता है, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में इसकी गूंज सुनाई देगी:

  • ग्लोबल ऑयल मार्केट में भूचाल: दुनिया का लगभग 20% से 30% तेल और भारी मात्रा में लिक्विफाइड नेचुरल गैस इसी रास्ते से गुजरती है। अगर ईरान इसे ब्लॉक कर देता है, तो ग्लोबल ऑयल सप्लाई चेन तुरंत टूट जाएगी। कच्चे तेल की कीमतों में रातों-रात जबरदस्त उछाल आएगा और यह 100 डॉलर से 150 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार कर सकती हैं।
  • वैश्विक आर्थिक मंदी (Global Recession): तेल की कीमतों में इस बेतहाशा वृद्धि से दुनिया भर में ट्रांसपोर्टेशन और मैन्युफैक्चरिंग की लागत आसमान छूने लगेगी। इसका सीधा और सबसे भयानक असर महंगाई के रूप में दिखेगा, जो भारत, यूरोप और अमेरिका जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को एक गहरी मंदी की ओर धकेल देगा।
  • शेयर बाज़ारों में ऐतिहासिक क्रैश: होर्मुज के बंद होने की खबर मात्र से एशियाई और पश्चिमी शेयर बाज़ारों में भारी घबराहट और गिरावट देखने को मिलेगी। निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से तेजी से पैसा निकालेंगे और उसे सुरक्षित माने जाने वाले सोने तथा अमेरिकी डॉलर में झोंक देंगे। इससे सोने की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल आना तय है।
  • सप्लाई चेन का ठप होना: खाड़ी देशों (सऊदी अरब, यूएई, कतर आदि) से होने वाला समुद्री व्यापार पूरी तरह से पंगु हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में एक ईरानी राजनयिक ने पहले ही चेतावनी दी है कि ईरान इन हमलों के बाद झुकने वाला नहीं है। लगातार मिसाइल हमलों और होर्मुज की नाकाबंदी से इस क्षेत्र के कमर्शियल बंदरगाह और हवाई रास्ते लंबे समय के लिए बंद हो जाएंगे, जिससे दुनिया भर में एक भयानक सप्लाई चेन संकट पैदा हो जाएगा।

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