
आइना भी हैरान है देख कर उनकी अदाएं, वो खुद ही खबर हैं, और खुद ही अफवाहें। सियासत समझ बैठे हैं वो ‘रियलिटी शो’, जहां हर रोज नया तमाशा दिखाना है।
दुनियाभर में आज सबसे ज्यादा किसी राजनेता की चर्चा होती है तो वो हैं डोनाल्ड ट्रम्प। अगर राजनीति में ‘सुर्खियों में बने रहने’ का कोई ओलंपिक खेल होता, तो डोनाल्ड ट्रम्प निश्चित तौर पर गोल्ड मेडल जीत चुके होते। आज की दुनिया में वो एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने गंभीर कूटनीति को एक ‘रियलिटी टीवी शो’ के रोमांच में बदल दिया है। आखिर, कौन सा राष्ट्रपति होगा जो सोशल मीडिया पर ही 10 से ज्यादा ‘वर्चुअल न्यूक्लियर युद्ध’ लड़ चुका हो और बातों-बातों में ग्रीनलैंड जैसे देश को किसी खिलौने की तरह खरीदने की बोली लगा दे? ट्विटर (X) की टाइमलाइन से लेकर टेलीविजन की प्राइम टाइम डिबेट तक, हर दूसरी हेडलाइन में ट्रम्प का ही नाम होता है।
उनके लिए कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य घोषित करना या बयानों में 8 युद्ध रुकवाना कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि आलोचक मानते हैं कि ट्रम्प खुद को अमेरिका का अब तक का ‘सबसे बेहतर राष्ट्रपति’ घोषित करने की सनक में जी रहे हैं। उनकी इस सनक का आलम यह है कि जब दुनिया ने उन्हें नोबेल प्राइज नहीं दिया, तो उन्होंने अपने करीबी दोस्त (FIFA के प्रेसिडेंट) के जरिए खुद को ही पहला ‘FIFA पीस प्राइज’ दिलवा दिया। और इस पूरे वाकये की सबसे मजेदार बात यह रही कि प्राइज मिलते वक्त ट्रम्प ने किसी और का इंतजार नहीं किया, बल्कि खुद ही उस ‘शांति पुरस्कार’ की माला अपने गले में डाल ली। ट्रम्प ने दुनिया को सिखाया है कि सत्ता चलाने के लिए ‘विज़न’ से ज्यादा ‘टेलीविजन’ की समझ होनी चाहिए।
लेकिन सवाल यह उठता है कि यह सब सिर्फ एक नाटक है या इसके पीछे कोई गहरा बिजनेस मॉडल काम कर रहा है? ट्रम्प की छवि एक गंभीर राजनेता की कम और एक रियलिटी टीवी स्टार की ज्यादा लगती है, जो दर्शकों को बांधे रखने के लिए हर रोज नया ड्रामा रचता है।
ट्रम्प की छवि: बचकाना हरकत या तानाशाही रवैया?
ट्रम्प का व्यवहार अक्सर दुनिया को इस उलझन में डाल देता है कि वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति हैं या कोई जिद्दी बच्चा। उनकी कार्यशैली में कभी एक हठीले बच्चे की झलक मिलती है जो अपने सलाहकारों की बात सुनने से साफ इनकार कर देता है, तो कभी एक तानाशाह का रूप दिखता है जो मीडिया को “जनता का दुश्मन” घोषित कर देता है। इस व्यवहार का सबसे ज्वलंत उदाहरण तब देखने को मिला जब उन्होंने उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन को ट्विटर पर धमकी दी थी। जहाँ पूरी दुनिया परमाणु युद्ध की आशंका से कांप रही थी, वहीं ट्रम्प ने एक बेहद बचकाना ट्वीट करते हुए लिखा, “मेरे पास भी न्यूक्लियर बटन है, और वह तुम्हारे बटन से बहुत बड़ा और ताकतवर है, और मेरा बटन काम भी करता है!” बराक ओबामा या जॉर्ज बुश जैसे पूर्व राष्ट्रपतियों में जो गंभीरता और ठहराव दिखता था, ट्रम्प में उसका पूरी तरह अभाव है। वे कूटनीति के स्थापित नियमों को नहीं मानते, बल्कि उन्हें तोड़कर अपनी अलग ही राह बनाने में विश्वास रखते हैं।
पॉलिटिकल जोकर या सोशल मीडिया के किंग?
ट्रम्प की अजीबोगरीब हरकतों और बयानों ने उन्हें आलोचकों की नज़र में एक ‘पॉलिटिकल जोकर’ बना दिया है, लेकिन सोशल मीडिया पर यही हरकतें उन्हें ‘किंग’ बनाए रखती हैं। उनकी सबसे मशहूर गलतियों में से एक ‘कोवफेफे’ (Covfefe) वाला अधूरा ट्वीट था, जिसने पूरी दुनिया को रात भर यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर इस शब्द का मतलब क्या है। बात सिर्फ टाइपिंग की गलतियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके विचारों ने भी दुनिया को चौंकाया। कभी उन्होंने ग्रीनलैंड देश को खरीदने की इच्छा जताई जैसे वह कोई रियल एस्टेट की जमीन हो, तो कभी कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने का विचार दे डाला। कोरोना महामारी के दौरान उनका यह सुझाव कि शरीर के अंदर डिसइन्फेक्टेंट (कीटाणुनाशक) या ब्लीच का इंजेक्शन डालकर वायरस को मारा जा सकता है, विज्ञान जगत और आम जनता के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। ऐसे बयान उन्हें हंसी का पात्र जरूर बनाते हैं, लेकिन इन्हीं की बदौलत वे हर वक्त खबरों में छाए रहते हैं।
बयानों के पीछे का बिजनेस मॉडल: ‘अराजकता में अवसर‘
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि ट्रम्प बिना सोचे-समझे बोलते हैं, लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे एक गहरा और सोचा-समझा बिजनेस मॉडल काम करता है। ट्रम्प मूल रूप से एक बिजनेसमैन हैं और वर्तमान में राष्ट्रपति की कुर्सी पर रहते हुए भी वे राजनीति को मुनाफे और घाटे के नजरिए से ही देख रहे हैं। उनका सिद्धांत है- ‘बदनामी में भी नाम है’। वे जानते हैं कि शांत बयानों से मीडिया में जगह नहीं मिलती, इसलिए वे जानबूझकर ‘अराजकता’और विवाद पैदा करते हैं। यह ‘अटेंशन इकोनॉमी’ का खेल है। आज स्थिति यह है कि उनके एक ट्वीट या बयान से वॉल स्ट्रीट में भूचाल आ जाता है। हाल ही में जब उन्होंने एक बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनी को दूसरे देश में प्लांट लगाने पर भारी टैक्स थोपने की धमकी दी, तो मिनटों में उस कंपनी के शेयर धड़ाम से नीचे गिर गए और निवेशक घबरा गए। आलोचकों का मानना है कि वे इस अराजकता का इस्तेमाल अपनी ताकत दिखाने के लिए करते हैं, मानो वे दुनिया को बता रहे हों कि सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था उनकी एक उंगली के इशारे पर नाचती है।
‘यू–टर्न‘ के उस्ताद: बोलते कुछ और, करते कुछ और
डोनाल्ड ट्रम्प को अपनी बातों से पलटने या ‘यू-टर्न’ लेने में महारत हासिल है। लेकिन ट्रम्प इसे अपनी नेगोशिएशन की रणनीति मानते हैं, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब ‘द आर्ट ऑफ द डील’ में भी किया है। वे अपने विरोधियों को भ्रमित करने के लिए पल-पल में अपना रुख बदलते रहते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर कोरिया के साथ उनके रिश्ते हैं। पहले उन्होंने किम जोंग उन को “लिटिल रॉकेट मैन” कहकर दुनिया के सामने उनका मजाक उड़ाया, लेकिन कुछ ही महीनों बाद वे उन्हें “बहुत अच्छा इंसान” और “महान नेता” बताने लगे। इसके अलावा, उनकी कथनी और करनी में भी भारी अंतर दिखता है। वे रैलियों में “अमेरिका फर्स्ट” का नारा देते हैं और स्थानीय विनिर्माण पर जोर देते हैं, लेकिन उनके खुद के ब्रांड के कपड़े और उत्पाद अक्सर चीन, मेक्सिको या अन्य देशों में बनते हैं। यह व्यवहार उन्हें अविश्वसनीय बनाता है, लेकिन ट्रम्प के लिए यह सिर्फ डील जीतने का एक तरीका है।
अहंकार और नोबेल शांति पुरस्कार की सनक
ट्रम्प का अहंकार इतना विशाल है कि वे खुद को इतिहास का सबसे महान राष्ट्रपति साबित करने की होड़ में लगे रहते हैं। उन्हें दूसरों से तारीफ और मान्यता की गहरी भूख है। उन्होंने कई बार रैलियों में और प्रेस के सामने खुलकर शिकायत की है कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार क्यों नहीं मिला, जबकि उनका दावा है कि उन्होंने दुनिया के 7-8 बड़े युद्ध रुकवाए हैं और वे ओबामा से ज्यादा इसके हकदार हैं। वे अक्सर कहते हैं, “मैं ही अकेला इसे ठीक कर सकता हूँ” (I alone can fix it)। यह सोच उन्हें एक टीम प्लेयर नहीं, बल्कि एक आत्म-मुग्ध व्यक्ति बनाती है। जहाँ अब्राहम लिंकन या नेल्सन मंडेला जैसे महान नेता अपनी टीम और जनता को श्रेय देते थे, ट्रम्प हर सफलता का सेहरा अपने सिर बांधना चाहते हैं और हर विफलता का दोष दूसरों पर मढ़ देते हैं।
टीवी प्रेजेंटर से राष्ट्रपति तक का सफर
डोनाल्ड ट्रम्प को समझने के लिए उनके अतीत को देखना ज़रूरी है। राजनीति में आने से पहले वे एक सफल रियलिटी टीवी स्टार थे, जो ‘द अपरेंटिस’ शो को होस्ट करते थे। उन्हें बखूबी पता है कि दर्शकों को अपनी सीट से कैसे बांधे रखना है और टीआरपी (TRP) कैसे बटोरनी है। व्हाइट हाउस में आने के बाद भी उन्होंने अपनी कार्यशैली नहीं बदली। उनका राष्ट्रपति कार्यकाल किसी रियलिटी शो के सीजन जैसा ही है। जहाँ हर रोज़ नया ड्रामा, सस्पेंस और ट्विस्ट देखने को मिलता है। वे एक ‘परफॉर्मर’ हैं जिन्होंने राजनीति के मंच को एक टीवी स्टूडियो में बदल दिया है। उनका हर ट्वीट, हर रैली और हर बयान एक स्क्रिप्टेड ड्रामा जैसा लगता है जिसका मकसद सिर्फ और सिर्फ जनता का ध्यान अपनी ओर खींचना है। चाहे आप उन्हें पसंद करें या नफरत, आप उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते, और शायद एक शोमैन के रूप में यही उनकी सबसे बड़ी जीत है।