हजारों मौतें, बर्बाद होती करैंसी; क्या अमेरिका ने लिखी है ईरान में तख्तापलट की पटकथा?

ईरान की सड़कें पिछले 17 दिनों से जिस तरह सुलग रही हैं, उसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। तेहरान से लेकर देश के दूरदराज के इलाकों तक मचा यह कोहराम अब महज एक सामान्य विरोध प्रदर्शन नहीं रहा, बल्कि यह एक भीषण खूनी संघर्ष और संभावित गृहयुद्ध की शक्ल अख्तियार कर चुका है। जहाँ एक तरफ सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खमेनेई की सत्ता के खिलाफ लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है, वहीं दूसरी तरफ ईरानी अर्थव्यवस्था की रीढ़ पूरी तरह टूट चुकी है। पिछले दो हफ्तों से जारी इस हिंसा में 2,000 से ज्यादा लोगों की मौत, 4,000 से अधिक घायलों की चीखें और जेलों में ठूंसे गए 10,000 से ज्यादा प्रदर्शनकारी इस बात की गवाही दे रहे हैं कि ईरान अब एक ऐतिहासिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। हालांकि, इस अराजकता के पीछे सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ईरान की इस बर्बादी और खून-खराबे के पीछे अमेरिका की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ पॉलिसी और डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीति का हाथ है?

खमेनेई के खिलाफ आर-पार की लड़ाई और खून से सनी सड़कें

ईरान में जारी मौजूदा प्रदर्शन अब तक के सबसे हिंसक और निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुके हैं। मानवाधिकार संगठनों और स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, सुरक्षा बलों द्वारा किए गए दमन ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया है। सड़कों पर उतरे लाखों लोग अब केवल नारे नहीं लगा रहे, बल्कि उनका सीधा निशाना इस्लामिक रिपब्लिक के सुप्रीम लीडर अली खमेनेई हैं। प्रदर्शनकारी अपनी जान की परवाह किए बिना ‘तानाशाही मुर्दाबाद’ और ‘हमें आजादी चाहिए’ की मांग कर रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि जनता का डर अब खत्म हो चुका है। सरकार ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए 10,000 से ज्यादा लोगों को जेलों में डाल दिया है, लेकिन हिंसा रुकने के बजाय और भड़कती जा रही है। यह संघर्ष अब सत्ता और जनता के बीच की आर-पार की लड़ाई बन गया है।

ट्रंप का ‘ट्रुथ’ और अमेरिका का सत्ता परिवर्तन का एजेंडा

ईरान की इस आग में घी डालने का काम अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों और फैसलों ने किया है, जिससे यह शक गहराता है कि अमेरिका वहां सत्ता परिवर्तन चाहता है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘Truth Social’ पर एक पोस्ट के जरिए वैश्विक समुदाय को साफ चेतावनी दी है कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापार जारी रखेगा, अमेरिका उस पर 25% अतिरिक्त टैरिफ (Extra Tariffs) लगाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की मंशा ईरान में कट्टरपंथी इस्लामी शासन को आर्थिक रूप से घुटनों पर लाकर वहां एक ऐसी सरकार स्थापित करना है जो पश्चिमी देशों के प्रति नरम हो। ट्रंप ने कूटनीतिक मर्यादाओं को दरकिनार करते हुए सीधे ईरानी नागरिकों को संबोधित किया है और उन्हें ‘आजादी की लड़ाई’ के लिए उकसाया है।

शून्य होती करैंसी और ध्वस्त होती अर्थव्यवस्था

सड़कों पर मचे इस राजनीतिक कोहराम के बीच ईरान की आर्थिक नाकेबंदी ने आम नागरिकों का जीवन पूरी तरह से नरक बना दिया है। ईरानी मुद्रा ‘रियाल’ की हालत इतिहास में सबसे बदतर स्तर पर पहुंच गई है और डॉलर के मुकाबले यह ‘शून्य’ को पार कर चुकी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अब ईरानी करैंसी का कोई वास्तविक मूल्य नहीं बचा है। देश में आर्थिक ढांचा इस कदर चरमरा गया है कि एक डॉलर खरीदने के लिए लोगों को बोरों में भरकर नोट ले जाने पड़ रहे हैं। इस आर्थिक पतन ने ईरान के मध्यम और गरीब वर्ग की कमर तोड़ दी है, और यही आर्थिक लाचारी अब सड़कों पर सरकार के खिलाफ उग्र गुस्से के रूप में बाहर आ रही है।

आखिर क्यों उबल रहा है ईरान? महंगाई की मार और आजादी की पुकार

ईरान में सरकार के खिलाफ फूट रहे इस भयानक जनआक्रोश की सबसे बड़ी वजह आसमान छूती महंगाई (Inflation) और बुनियादी चीजों की भारी किल्लत है। अतिमुद्रास्फीति ने लोगों की जमा-पूंजी को राख कर दिया है; खाने-पीने का सामान, दवाइयां और रोजमर्रा की जरूरतें आम आदमी की पहुंच से पूरी तरह बाहर हो चुकी हैं। लोग भूख और गरीबी से तंग आकर अब यह मान चुके हैं कि मौजूदा व्यवस्था उनके पेट की आग नहीं बुझा सकती। लेकिन गुस्सा सिर्फ महंगाई तक सीमित नहीं है, इसकी जड़ें दशकों से चले आ रहे सामाजिक दमन में भी गहरी धंसी हुई हैं। ‘मोरलिटी पुलिस’ का खौफ और महिलाओं व युवाओं की आजादी पर लगी सख्त पाबंदियों ने लोगों का दम घोंट दिया है। साथ ही, जनता इस बात से भी खफा है कि देश का पैसा जनता की भलाई के बजाय विदेशों में प्रॉक्सी युद्ध लड़ने और भ्रष्टाचार में बर्बाद किया जा रहा है। महंगाई की मार और आजादी की चाहत ने मिलकर इस विरोध को एक बारूद के ढेर में बदल दिया है।

भारत के लिए कूटनीतिक धर्मसंकट और टैरिफ वॉर का खतरा

ट्रंप का यह नया आर्थिक फरमान भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और व्यापारिक चुनौती बनकर उभरा है। भारत और ईरान के बीच पारंपरिक रूप से गहरे व्यापारिक रिश्ते रहे हैं, विशेषकर चाय और चावल के निर्यात में। आंकड़ों पर गौर करें तो वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत ने ईरान को 468.10 मिलियन डॉलर मूल्य का लगभग 6 लाख टन चावल निर्यात किया था, जो भारतीय किसानों और निर्यातकों के लिए एक बड़ा बाजार है। अब भारत के सामने एक तरफ ईरान के साथ अपने पुराने संबंधों और व्यापार को बचाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के 25% एक्स्ट्रा टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है। अगर भारत ईरान से व्यापार जारी रखता है, तो भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में महंगा हो जाएगा, और अगर वह पीछे हटता है, तो उसे बासमती चावल के एक विशाल बाजार से हाथ धोना पड़ेगा।

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