
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने कार्यकाल के दौरान दुनिया भर में चल रहे 8 युद्धों को रुकवाने और खुद को एक ‘शांतिदूत’ के रूप में पेश करने का दावा भले ही करते हों, लेकिन धरातल पर अमेरिकी विदेश नीति की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। सीरिया में बशर अल-असद की सत्ता को चुनौती देने के बाद वेनेजुएला में निकोलस मादुरो और अब ईरान पर बढ़ता अमेरिकी दबाव, महज एक संयोग नहीं हो सकता। अगर इन तीनों देशों की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति का विश्लेषण किया जाए, तो एक बात जो इन सबमें समान निकलकर आती है, वह है— ‘ब्लैक गोल्ड’ यानी कच्चा तेल (Crude Oil), दुनिया का महाशक्ति कहा जाने वाला अमेरिका “लोकतंत्र” की बहाली की दुहाई देता है, लेकिन उसकी नजरें असल में इन देशों के विशाल तेल भंडारों पर टिकी हैं, जो उसकी अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने की चाबी साबित हो सकते हैं।
वेनेजुएला: 17 ट्रिलियन डॉलर का खजाना और अमेरिकी नजर
वेनेजुएला इस भू-राजनीतिक खेल का सबसे ज्वलंत उदाहरण है। दक्षिण अमेरिका का यह देश दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल के भंडार का मालिक है। वेनेजुएला के पास लगभग 300 बिलियन बैरल कच्चा तेल मौजूद है। अगर मौजूदा अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव के हिसाब से इसकी गणना करें, तो यह संपत्ति लगभग 17 ट्रिलियन डॉलर की बैठती है। यह रकम इतनी विशाल है कि यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के आंकड़ों को छूती है। तुलनात्मक रूप से देखें तो अमेरिका की कुल अर्थव्यवस्था 30 ट्रिलियन डॉलर, चीन की 19 ट्रिलियन और भारत की 4 ट्रिलियन डॉलर है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ट्रंप की ‘एंटी-वॉर’ छवि के पीछे अमेरिका का कोई बड़ा निजी आर्थिक स्वार्थ छिपा है? अमेरिका जानता है कि जिस देश के पास ऊर्जा के स्रोत हैं, भविष्य की दुनिया उसी के इशारों पर नाचेगी।
लोकतंत्र की आड़ में तेल पर कब्जे की जंग
वेनेजुएला पर अमेरिकी आक्रामकता को सिर्फ वहां की राजनीतिक अस्थिरता या तानाशाही से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। भू-राजनीति के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि ट्रंप का मुख्य लक्ष्य वेनेजुएला के तेल भंडारों पर अमेरिकी कंपनियों का नियंत्रण स्थापित करना है। वेनेजुएला ओपेक (OPEC) का एक प्रमुख सदस्य है और तेल की कीमतों को तय करने में अहम भूमिका निभाता है। यदि अमेरिका वहां तख्तापलट करवाकर अपनी पसंद की सरकार या कहें कि एक ‘कठपुतली सरकार’ बैठाने में सफल हो जाता है, तो ग्लोबल ऑयल मार्केट पर वाशिंगटन का एकतरफा राज हो जाएगा। इससे अमेरिका न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करेगा, बल्कि तेल की कीमतों को भी अपने हिसाब से नियंत्रित कर सकेगा, जो सीधे तौर पर उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा और रूस, चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों देश को कमजोर करेगा।
सीरिया और वेनेजुएला के जरिए रूस पर सीधा निशाना
सीरिया और वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप को अगर गहराई से देखें, तो यह सीधा हमला रूस की वैश्विक ताकत पर है। व्लादिमीर पुतिन, सीरिया में बशर अल-असद और वेनेजुएला में निकोलस मादुरो के सबसे बड़े समर्थक रहे हैं। रूस की सरकारी तेल कंपनी ‘रोसनेफ्ट’ (Rosneft) ने वेनेजुएला के तेल सेक्टर में अरबों डॉलर का निवेश कर रखा है। ट्रंप प्रशासन अच्छी तरह जानता है कि अगर वहां तख्तापलट होता है और अमेरिकी समर्थक सरकार आती है, तो रूस का यह पूरा निवेश डूब सकता है और उसकी अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लगेगा। इसके अलावा, सीरिया और वेनेजुएला दोनों ही रूस के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ठिकाने हैं। इन देशों में अपनी पसंद की सरकार गिरवाकर ट्रंप असल में रूस के वैश्विक प्रभाव को खत्म करना चाहते हैं, ताकि शीत युद्ध के बाद की तरह अमेरिका ही दुनिया का एकमात्र सुपरपावर बना रहे।
यूरोपीय देशों की नाराजगी और पश्चिमी गठबंधन में दरार
हैरानी की बात यह है कि अमेरिका के पारंपरिक यूरोपीय सहयोगी—खासकर फ्रांस, इटली और जर्मनी—भी ट्रंप की इस आक्रामक ‘तख्तापलट नीति’ से खुश नहीं हैं। इसके पीछे कई ठोस और व्यावहारिक कारण हैं। यूरोपीय देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहते। उन्हें डर है कि अगर अमेरिका वेनेजुएला या ईरान के तेल पर एकाधिकार जमा लेता है या वहां युद्ध छेड़ देता है, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिसका सीधा और नकारात्मक असर पहले से संघर्ष कर रही यूरोपीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसके अलावा, यूरोप अभी भी सीरिया युद्ध से उपजे शरणार्थी संकट (Refugee Crisis) से पूरी तरह नहीं उबर पाया है। अगर अब वेनेजुएला या ईरान में गृहयुद्ध छिड़ता है, तो पलायन का एक नया और भयानक दौर शुरू होगा। भौगोलिक रूप से अमेरिका दूर है, इसलिए शरणार्थियों का बोझ एक बार फिर पश्चिमी देशों को ही उठाना पड़ेगा। यही वजह है कि वे ट्रंप की इस “धौंस वाली कूटनीति” से नाराज हैं जो सहयोगियों के हितों को दरकिनार कर सिर्फ अमेरिकी स्वार्थ को साधती है।