आधी रात वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण: ट्रंप के ‘शांति मिशन’ की खौफनाक हकीकत

ट्रंप ने अपने एक साल के कार्यकाल के दौरान 8 युद्ध खत्म करने का हेडलाइन्स जरूर बनवाई लेकिन वास्तविक हकीकत ठीक वैसा ही है जैसे गाजा में 2 लाख से ज्यादा मासूम बच्चों की मौत हो गई और ट्रंप शांति सम्मेलन का ढिंढोरा पिटते रहे। अब, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी सेना द्वारा गिरफ्तार किए जाने की घटना ने एक बार फिर दुनिया को दो धड़ों में बांट दिया है। क्या यह लोकतंत्र की बहाली है, या फिर किसी संप्रभु राष्ट्र की छाती पर बंदूक रखकर अपनी मनमर्जी थोपना? आइए इस घटना के हर पहलू का गहराई से विश्लेषण करते हैं।

ट्रंप सरकार ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण क्यों किया?

अमेरिकी सेना द्वारा किसी दूसरे देश के राष्ट्रपति को उसके ही महल से उठा लेना कोई साधारण भू-राजनीतिक घटना नहीं है। इसके पीछे अमेरिका द्वारा दिए गए आधिकारिक तर्क और छिपे हुए आर्थिक कारण दोनों ही गहरे हैं। डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने इस कार्रवाई को “ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व” (Operation Absolute Resolve) का नाम दिया है, जिसके तहत उन्होंने निकोलस मादुरो पर ‘नार्को-टेररिज्म’ यानी मादक पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद का गंभीर आरोप लगाया है। अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) का दावा है कि मादुरो की सरकार “कार्टेल ऑफ द सन” (Cartel of the Suns) नामक एक आपराधिक सिंडिकेट चला रही थी, जो बड़े पैमाने पर अमेरिका में कोकीन की तस्करी के लिए जिम्मेदार है। इसी आधार पर उन पर 2020 में ही करोड़ों डॉलर का इनाम घोषित कर दिया गया था।

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल नशामुक्ति अभियान नहीं मानते। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण जुलाई 2024 में हुए वेनेजुएला के विवादित चुनाव हैं। इन चुनावों में विपक्षी उम्मीदवार एडमंडो गोंजालेज ने जीत का दावा किया था और कई सबूत भी पेश किए थे, लेकिन निकोलस मादुरो ने खुद को विजेता घोषित कर सत्ता पर पकड़ बनाए रखी। अमेरिका इसे “लोकतंत्र की चोरी” मानता है। लेकिन पर्दे के पीछे असली खेल “तेल” का है। वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है, जो अब तक रूस और चीन के प्रभाव क्षेत्र में था। ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत, इस विशाल ऊर्जा भंडार को अमेरिका-समर्थक सरकार के हाथों में देना एक बड़ी आर्थिक प्राथमिकता थी, जिसे अब मादुरो को हटाकर पूरा करने की कोशिश की जा रही है।

वेनेजुएला का राजनीतिक इतिहास: अंदरूनी कलह और बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप

वेनेजुएला की मौजूदा त्रासदी को समझने के लिए हमें इसके इतिहास की गहराइयों में जाना होगा, जहां लोकतंत्र और तानाशाही के बीच की लकीर हमेशा धुंधली रही है। 1958 में वेनेजुएला में तानाशाही के खातमे के बाद ‘पुंटोफिजो पैक्ट’ (Puntofijo Pact) हुआ, जिसने देश में लोकतंत्र की नींव तो रखी, लेकिन यह केवल दो पार्टियों—सेंटर-लेफ्ट ‘डेमोक्रेटिक एक्शन’ (AD) और सेंटर-राइट ‘COPEI’—के बीच सत्ता का बंटवारा बनकर रह गया। दशकों तक तेल की कमाई से देश चलता रहा, लेकिन 1980 के दशक में तेल की कीमतों में गिरावट और 1989 के ‘काराकाज़ो’ दंगों ने इस व्यवस्था की पोल खोल दी। जनता में भारी असंतोष था, जिसका फायदा उठाकर 1998 में ह्यूगो चावेज़ सत्ता में आए और उन्होंने “बोलिवेरियन क्रांति” की शुरुआत की।

ह्यूगो चावेज़ ने देश की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने ‘यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी ऑफ वेनेजुएला’ (PSUV) का गठन किया और तेल की कमाई को गरीबों के लिए आवास और स्वास्थ्य योजनाओं में लगाना शुरू किया। इससे वे गरीबों के मसीहा बन गए, लेकिन अमीर वर्ग और अमेरिका उनके कट्टर दुश्मन हो गए। यहीं से विदेशी शक्तियों का खुला हस्तक्षेप शुरू हुआ। 2002 में अमेरिका के कथित समर्थन से चावेज़ के खिलाफ तख्तापलट की कोशिश हुई, जो विफल रही। 2013 में चावेज़ की मृत्यु के बाद निकोलस मादुरो ने सत्ता संभाली। मादुरो के पास न तो चावेज़ जैसा करिश्मा था और न ही तेल की ऊंची कीमतें। उनकी सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा और अर्थव्यवस्था रसातल में चली गई, जिससे विपक्ष को नई संजीवनी मिली।

वेनेजुएला की राजनीति में मोड़ तब आया जब 2015 के संसदीय चुनावों में विपक्षी गठबंधन (MUD) ने जीत हासिल की। अपनी हार को देखते हुए मादुरो ने सुप्रीम कोर्ट का इस्तेमाल कर संसद की शक्तियों को छीन लिया और एक समानांतर ‘संविधान सभा’ का गठन कर दिया। यहीं से वेनेजुएला पूर्ण तानाशाही की ओर बढ़ा। 2019 में अमेरिका ने विपक्षी नेता जुआन गुआइदो को अंतरिम राष्ट्रपति मान्यता दी और मादुरो पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, जिससे वहां की जनता दाने-दाने को मोहताज हो गई। आलोचकों का कहना है कि अमेरिका ने मादुरो को कमजोर करने के लिए जानबूझकर वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को तोड़ा, ताकि वहां गृहयुद्ध जैसे हालात बनें और उन्हें हस्तक्षेप का मौका मिले। रूस और क्यूबा ने मादुरो को बचाने के लिए अपनी सेना और खुफिया तंत्र की मदद दी, जिससे वेनेजुएला शीत युद्ध के अखाड़े में तब्दील हो गया।

भविष्य पर प्रभाव: अमेरिका ने दुनिया के लिए क्या उदाहरण सेट किया?

ट्रंप प्रशासन का यह कदम भविष्य की वैश्विक राजनीति (Geopolitics) के लिए बेहद खतरनाक उदाहरण पेश करता है। संयुक्त राष्ट्र (UN) चार्टर के अनुसार, किसी देश की सीमा में घुसकर उसके मुखिया को गिरफ्तार करना उस देश की संप्रभुता (Sovereignty) पर सीधा हमला है। इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून केवल कमजोर देशों के लिए हैं। “जिसकी लाठी, उसकी भैंस” (Might is Right) की यह नीति अब छोटे और संसाधन-संपन्न देशों को असुरक्षित महसूस करा रही है। यह कार्रवाई ईरान, उत्तर कोरिया और निकारागुआ जैसे देशों के लिए सीधा संदेश है कि अगर वे अमेरिका के हितों के खिलाफ जाएंगे, तो उनका हश्र भी मादुरो जैसा हो सकता है।

इसका परिणाम यह होगा कि दुनिया और अधिक अस्थिर हो जाएगी। अब देश अपनी सुरक्षा के लिए पारंपरिक कूटनीति के बजाय परमाणु हथियारों की होड़ में और तेजी लाएंगे, क्योंकि उन्हें लगेगा कि केवल परमाणु शक्ति ही उन्हें अमेरिका के सीधे आक्रमण से बचा सकती है। इसके अलावा, अगर “शांति” और “लोकतंत्र” लाने का तरीका “आक्रमण” और “अपहरण” बन जाए, तो यह लोकतंत्र की मूल भावना के ही खिलाफ है। यह घटना लैटिन अमेरिका में वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधाराओं के बीच की खाई को और चौड़ा करेगी, जिससे भविष्य में प्रॉक्सी वॉर (Proxy Wars) का खतरा बढ़ जाएगा।

दुनिया के नेताओं की प्रतिक्रिया

इस घटना पर वैश्विक प्रतिक्रिया अत्यंत तीव्र और विभाजित है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसे “अंतर्राष्ट्रीय कानून की धज्जियां उड़ाना” और “दिनदहाड़े डकैती” करार दिया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यह कदम लैटिन अमेरिका में एक बड़े युद्ध को भड़का सकता है। वहीं, लैटिन अमेरिका के वामपंथी नेता, जैसे ब्राजील के राष्ट्रपति लूला और कोलंबिया के गुस्तावो पेट्रो, इस घटना से स्तब्ध हैं। उन्होंने इसे “साम्राज्यवाद की क्रूर वापसी” कहा है। उन्हें डर है कि जो आज वेनेजुएला के साथ हुआ, वह कल उनके साथ भी हो सकता है। दूसरी ओर, यूरोपीय यूनियन (EU) की प्रतिक्रिया दबी-छुपी है; वे मादुरो के हटने से खुश तो हैं, लेकिन जिस “तरीके” (Method) का इस्तेमाल अमेरिका ने किया है, उसे लेकर वे बेहद असहज हैं और इसे एक खतरनाक मिसाल मान रहे हैं।

डोनाल्ड ट्रंप इसे अपनी “महान जीत” बता रहे हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि बाहर से थोपी गई सरकारें अक्सर लंबे गृहयुद्ध का कारण बनती हैं। जैसे इराक में सद्दाम हुसैन को हटाने के बाद शांति नहीं, बल्कि तबाही आई थी, वैसे ही वेनेजुएला में मादुरो की गिरफ्तारी वहां की समस्याओं का अंत नहीं, बल्कि एक नए, खूनी अध्याय की शुरुआत हो सकती है।

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