सीरिया में तख्तापलट कर बाइडेन ने चला मास्टरस्ट्रोक ?

सीरिया में 50 सालों से सत्ता पर काबिज असद परिवार का दबदबा अब खत्म हो चुका है। सीरियाई सरकार के खिलाफ विद्रोही गुटों ने महज 11 दिनों में ही सीरिया के बड़े शहर अलेप्पो, होम्स और अब राजधानी दमिश्क पर भी अपना कब्जा जमा लिया है। रॉयटर्स के मुताबिक, राष्ट्रपति बशर अल असद परिवार सहित सीरिया छोड़कर रूस की राजधानी मॉस्को चले गए हैं। इसी बीच, सीरिया के प्रधानमंत्री मोहम्मद गाजी अल जलाली ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा है कि “मैं सीरिया में हूं और मेरा सीरिया छोड़ने का कोई इरादा नहीं है। मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि सीरिया में सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों में काम सुचारू रूप से चले और हमारे नागरिक सुरक्षित रहें।”

विपक्षी नेता अल बहरा ने कहा कि “सीरिया के इतिहास का काला युग खत्म हो चुका है।”

सीरिया ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स के अनुसार, इस लड़ाई में अब तक 800 लोग मारे जा चुके हैं, वहीं 3.7 लाख लोग विस्थापित हुए हैं। पिछले डेढ़ दशकों से चल रहे गृह युद्ध में विद्रोहियों ने अब सबसे मजबूत किला दमिश्क को भी फतह कर लिया है। हयात तहरीर अल शाम के प्रमुख अबू मोहम्मद अल जोलानी ने कहा कि “अब हम आज़ाद हो चुके हैं।” दमिश्क शहर में बशर अल असद के पिता हाफिज अल असद की प्रतिमा को विद्रोहियों ने तोड़ दिया है।

सीरिया के तख्तापलट में अमेरिका की भूमिका?

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल का यह आखिरी महीना है। अगले महीने, 20 जनवरी 2025 को, अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपना पदभार संभालेंगे। अमेरिका के इतिहास में ऐसा कम ही देखने को मिलता है, जब कोई राष्ट्रपति अपने आखिरी महीने में इतने बड़े फैसले ले। यूं कहा जा सकता है कि बाइडेन ट्रंप की मुश्किलें ऐसे बढ़ाना चाहते हैं कि ट्रंप के सत्ता में आने के बाद युद्ध सुलझने के बजाय उलझ जाए।

बाइडेन ने कुछ दिन पहले ही सभी नाटो देशों को रूस के खिलाफ जंग में यूक्रेन को लंबी दूरी वाली मिसाइलें और जरूरी उपकरण सप्लाई करने की छूट दे दी थी। अब इज़राइल-हिज़बुल्लाह युद्धविराम लागू होने के बाद सीरिया में अमेरिकी समर्थित कुर्द विद्रोही और हयात तहरीर अल शाम विद्रोही संगठन ने राजधानी दमिश्क पर कब्जा कर लिया है। यह कोई सहयोग नहीं हो सकता; अमेरिका ने पूरी योजना के तहत इसे अंजाम दिया है।

इज़राइल युद्धविराम के तुरंत बाद ईरान, जो सीरिया के रास्ते हिज़बुल्लाह को हथियार और मिसाइलें भेजा करता था, अब वह रुक चुका है, जिसके कारण हिज़बुल्लाह भी सीरिया की कोई मदद करने में अक्षम हो गया। दूसरी ओर, सीरिया का सबसे बड़ा समर्थक रूस, जो अभी खुद युद्ध में व्यस्त है, ऐसे में रूस भी सीरिया का साथ नहीं दे पाया।

सीरिया में विद्रोह का इतिहास

बशर अल असद 2000 ई. से सीरिया की सत्ता में बने हुए हैं। 2000, 2007, 2014 और 2021 में असद चौथी बार राष्ट्रपति बनने में सफल रहे। 1971 से लेकर 2000 ई. तक असद के पिता का शासन सीरिया में था।

2003 में अमेरिका से रिश्ते बिगड़ने के बाद सीरिया में कई ऐसे विद्रोही गुटों का जन्म हुआ जो असद सरकार को गिराने में लगे रहते थे। साल 2011 में, जब शांतिपूर्ण तरीके से चल रहे प्रदर्शन को सीरियाई सरकार ने दबाने की कोशिश की, तो यह प्रदर्शन गृह युद्ध में बदल गया, जिससे कई विद्रोही गुटों का जन्म हुआ। ये सारे गुट असद सरकार को सत्ता से बेदखल करना चाहते थे।

साल 2015 में सीरियाई फोर्सेज और विद्रोही गुटों के बीच भारी संघर्ष देखने को मिला। इस झड़प में अलग-अलग विद्रोही गुटों ने सीरिया के 30% से 40% हिस्से पर कब्जा कर लिया। असद सरकार उसी वक्त धराशायी हो जाती, लेकिन रूस, लेबनान, ईरान और हिज़बुल्लाह की मदद से सीरियाई सरकार विद्रोही गुटों को पीछे धकेलने में कामयाब रही।

2003 में सीरिया और अमेरिका के रिश्ते खराब होने शुरू हुए, वहीं सीरिया का झुकाव रूस की तरफ बढ़ने लगा। 2011 और 2015 में सीरिया सरकार और विद्रोहियों के बीच हुई झड़प में रूस ने सीरिया का खुलकर साथ दिया। 2015 में हुए युद्ध में रूस ने अपने हजारों सैनिक और रूसी फाइटर जेट भेजकर सीरिया की मदद की थी। इसके बदले सीरिया सरकार ने रूस को हेमिम का हवाई अड्डा और तार्तुस का नौसैनिक अड्डा 49 वर्षों के लिए लीज पर दे दिया, जिससे रूस भूमध्यसागर में अपने पैर जमाने में सफल रहा।

रूस के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुए अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने असद सरकार को हटाने के लिए कुर्द विद्रोहियों को धन और हथियारों की सप्लाई शुरू कर दी। लेकिन ट्रंप ने अपने कार्यकाल में इसमें कटौती कर दी। 2020 में डेमोक्रेटिक पार्टी के दोबारा सत्ता में लौटने के बाद कुर्दों को मदद फिर से शुरू कर दी गई, जिसके बाद अमेरिका की सक्रियता बढ़ गई।

ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स के अनुसार, सीरिया में 2011 के गृह युद्ध में 5 लाख लोगों की मौत हो गई, वहीं 1 करोड़ 60 लाख लोगों को पलायन करना पड़ा। बीते 13 सालों में सीरिया में कई अलग-अलग गुट बने, जिनमें से मुख्य गुटों का सीरिया के कई भागों पर कब्जा था।

साल 2015 में SDF (सीरिया डेमोक्रेटिक फोर्सेस) का गठन हुआ, जो पूर्वी सीरिया में काबिज था। इसे गुट को अमेरिका का समर्थन मिलता रहा है।

2011 में बना नुसरा फ्रंट, जिसने 2017 में अपना नाम बदलकर हयात तहरीर अल शाम रख लिया, मध्य सीरिया के इलाके में प्रभावी था। इसे तुर्की का समर्थन प्राप्त था।

साल 2011 में ही सीरियाई सेना के एक विद्रोही गुट ने सीरिया नेशनल आर्मी का गठन किया, जिसका दबदबा उत्तर-पश्चिमी इलाकों में हुआ करता था।

इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए कहा कि सीरिया-इज़राइल सीमा के निकट “गोलन हाइट्स” पर अब सीरिया का कब्जा होगा, क्योंकि हमारा समझौता सीरिया सरकार से था। अब, जब सीरिया की सरकार नहीं रही, तो यह समझौता प्रभावी नहीं रहा। अब तक की प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, इज़राइली सैनिकों ने गोलन हाइट्स के 10 किलोमीटर अंदर सीरियाई इलाके में कब्जा कर लिया है।

सीरिया में असद सरकार गिरने से भारत को संभावित नुकसान

भारत और सीरिया के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्ते हैं। भारत ने सीरिया में तिश्रीन थर्मल पावर प्लांट के पुनर्निर्माण के लिए 24 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया था। इतना ही नहीं, इंडिया-मिडल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर में भी भारत भारी निवेश करने की तैयारी कर रहा था, जिसमें सीरिया भी शामिल है। इसके अलावा, सीरिया के कनाडियन फॉर्म में ONGC और CNPC की 37% हिस्सेदारी है।

रणनीतिक नजरिए से देखें तो भी सीरिया भारत के लिए विशेष महत्व रखता था, क्योंकि कश्मीर मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सीरिया भारत का समर्थन करता रहा है। इसके बदले भारत भी गोलान हाइट्स को लेकर सीरिया का समर्थन करता रहा है। गोलान हाइट्स सीरिया और इज़राइल के बीच विवादित क्षेत्रों में से एक है। अब, सीरिया में असद सरकार के पतन के बाद, सीरिया को लेकर भारत के अगले रुख का इंतजार रहेगा।

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