
30 जुलाई की वह काली रात, जब प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखाया, अगली सुबह चारों ओर सिर्फ लाशें ही लाशें दिखाई दीं। चलियार नदी से 83 तैरती हुई लाशों को बाहर निकाला गया। तबाही इतनी भयानक थी कि पिछले 9 दिनों से रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 426 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनके शव बरामद कर लिए गए हैं, जबकि 200 लोग अभी भी लापता हैं, जिन्हें ड्रोन और मोबाइल जीपीएस के जरिए खोजा जा रहा है।
दरअसल, 30 जुलाई की रात करीब एक बजे फ्लैश फ्लड (बादल फटना) के कारण भूस्खलन हुआ, और देखते ही देखते वायनाड जिले के चार गांव (चूरलमाला, मुंडक्कई, अट्टमाला, और नूलपुझा) इसकी चपेट में आ गए।
वायनाड में उस रात मौजूद प्रत्यक्षदर्शी अमरावती के अनुसार, देर रात जोर की आवाज सुनाई दी। जब वह घर से बाहर निकलीं, तो देखा कि गाद वाली मिट्टी और नदी का पानी तेजी से गांव की ओर बढ़ रहा था। यह दृश्य देखकर वह भयभीत हो गईं और अपने परिवार के साथ घर छोड़कर जंगल की ओर भागीं। रात जंगल में गुजारने के बाद, अगली सुबह एनडीआरएफ की टीम ने उनका रेस्क्यू किया।
केरल में इतनी बारिश क्यों हुई ?
मौसम विभाग के अनुसार, 30 जुलाई को केरल के पास बादलों का जमावड़ा था। केरल के पूर्व में स्थित पश्चिमी घाट की ऊँची पहाड़ियों ने इन बादलों को फैलने या आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिया, जिससे फ्लैश फ्लड की स्थिति बनी। ऐसा ही कुछ 2013 में केदारनाथ त्रासदी के दौरान हुआ था, जब बादल पहाड़ों में फंस गए थे। यही वजह है कि वायनाड में इतनी भयंकर बारिश हुई, जिसके कारण भूस्खलन हुआ।
वायनाड में इतने ज्यादा भूस्खलन क्यों हुए?
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार, केरल के 43% क्षेत्र को भूस्खलन संभावित क्षेत्र माना जाता है। इडुक्की का 74% और वायनाड का 51% क्षेत्र पहाड़ी ढलानों पर स्थित है, जहाँ भूस्खलन की संभावना अधिक रहती है।
पश्चिमी घाट की ढलानों पर बसे वायनाड, कोझिकोड, मल्लपुरम, इडुक्की, कोट्टायम और पत्तनमतिट्टा जिलों में सबसे ज्यादा भूस्खलन होते हैं, क्योंकि यह क्षेत्र ढलानों पर स्थित हैं और यहाँ की मिट्टी क्ले होती है, जो भारी बारिश होने पर धंसने लगती है। 2019 में केरल के 8 जिलों में तीन दिनों के भीतर 80 भूस्खलन हुए थे, जिनमें 120 लोगों की जान चली गई थी।
जिले के ज्यादातर इलाके पहाड़ों से घिरे हुए हैं, जिसके कारण बारिश का पानी निचली सतह पर आ जाता है और बाढ़ की संभावना बनी रहती है।
वायनाड में इतने भूस्खलन क्यों होते हैं?
- जंगल की कटाई: केरल 100 वर्षों से चाय बागानों के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन लगातार पेड़ों की कटाई के कारण मृदा अपरदन और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं।
- भौगोलिक कारण: वायनाड पश्चिमी घाट की ढलानों पर बसा है, जहाँ पहाड़ी और खड़ी ढलानों के कारण भूस्खलन की संभावना अधिक रहती है।
- भारी बारिश: मानसून के दौरान वायनाड में अक्सर 2000 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश हो जाती है, जिससे मिट्टी पूरी तरह से संतृप्त हो जाती है और कटाव शुरू हो जाता है।
- मिट्टी की गुणवत्ता: वायनाड में ज्यादातर लैटराइट मिट्टी पाई जाती है, जो कमजोर और कटाव के प्रति संवेदनशील होती है। बारिश के कारण यह मिट्टी भारी हो जाती है और धंसने लगती है।
केंद्र सरकार और केरल सरकार ने हादसे को लेकर अब तक क्या कदम उठाए हैं?
केरल सरकार के अनुरोध पर केंद्र सरकार ने लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए एनडीआरएफ की विशेष टुकड़ी को वायनाड भेजा है। सेना ने 20 घंटे में बेली पुल बनाकर रेस्क्यू ऑपरेशन जारी रखा है। केंद्र ने लोगों की खोज के लिए विशेष उपकरण भी भेजे हैं और राज्य को हर संभव मदद देने का आश्वासन दिया है।
मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने भूस्खलन से विस्थापित लोगों के पुनर्वास की घोषणा की है। इसके बाद, राज्य के उद्योग मंत्री पी. राजीव ने कहा कि इसके लिए एक मॉडल परियोजना तैयार की जाएगी, जिसमें सभी क्षेत्रों का सहयोग शामिल होगा। बागान मालिकों और प्रतिनिधियों की एक बैठक में राजीव ने कहा कि सरकार का लक्ष्य सभी के सहयोग से एक सुरक्षित टाउनशिप परियोजना स्थापित करना है। यह पुनर्वास परियोजना आपदा राहत कोष के माध्यम से लागू की जाएगी।
वायनाड में हुए हादसे को लेकर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि इको-सेंसिटिव जोन में अवैध निर्माण और खनन नहीं होने चाहिए, क्योंकि इससे नुकसान उठाना पड़ता है।