अबकी बार 400 पार, इंडिया ना सही ब्रिटेन में लेबर पार्टी ने कर दिखाया…

ब्रिटेन में 5 जुलाई को आए नतीजों के बाद अब सत्ता परिवर्तन हो चुका है। लेबर पार्टी ने 14 साल का वनवास खत्म कर ब्रिटेन की सत्ता में वापसी की है। चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। 650 सीटों वाली हाउस ऑफ कॉमन्स में 412 सीटों के भारी बहुमत के साथ वामपंथी विचारधारा वाली लेबर पार्टी सत्ता में आई, जबकि ऋषि सुनक की कंजर्वेटिव पार्टी को 120 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। हाउस में बहुमत का आंकड़ा 326 है, लेकिन 412 सीटों के बहुमत के साथ लेबर पार्टी मजबूत स्थिति में है।

कंजर्वेटिव पार्टी की यह 200 वर्षों में सबसे बड़ी हार है। 2019 में कंजर्वेटिव पार्टी ने 650 सीटों में से 365 पर भारी जीत हासिल की थी। राजनीतिक अस्थिरता के कारण, ब्रिटेन में पिछले 14 वर्षों में 5 प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। चुनावी नतीजे आने के बाद, ऋषि सुनक ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपनी पार्टी के नेताओं से माफी मांगी। सुनक ने फोन कर नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर को जीत की बधाई दी। कीर स्टार्मर ने सरकार बनते ही अपने कैबिनेट का गठन कर लिया है। उन्होंने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए रेचल रीव्ज को वित्त मंत्री और एंजेला रेयर को उप प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। रेचल ब्रिटेन की पहली महिला वित्त मंत्री बनी हैं, जिन्होंने बैंकिंग क्षेत्र से अपना करियर शुरू किया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद, कीर स्टार्मर ने ऋषि सुनक की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने देश के विकास के लिए अच्छे प्रयास किए हैं।

ऋषि सुनक के चुनाव हारने के कारण

2019 से जून 2024 तक ब्रिटेन में तीन प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। इसका सीधा मतलब है कि जनता में सत्ता के प्रति अविश्वास और नाराज़गी बढ़ रही है। 2019 में ब्रेग्जिट के नाम पर लोगों ने बोरिस जॉनसन को भारी बहुमत से जिताया, लेकिन कोरोना महामारी के दौरान हुई लापरवाही के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। उसके बाद, लिज़ ट्रस भी केवल 8 महीने प्रधानमंत्री रहीं, लेकिन अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत के कारण उन्हें भी पद छोड़ना पड़ा। अक्टूबर 2022 में ऋषि सुनक प्रधानमंत्री बने, लेकिन उनके कार्यकाल में महंगाई दोगुनी हो गई।

हार के कुछ प्रमुख कारण

  1. बढ़ती महंगाई: 2020 में आई कोरोना महामारी के बाद से ही ब्रिटेन महंगाई से उबर नहीं पाया। रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई, और ब्रिटेन, जर्मनी जैसे देश कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के लिए रूस पर निर्भर थे, जो युद्ध के बाद पूरी तरह से बंद हो गया। दैनिक जीवन की वस्तुओं और खाद्य सामग्री की कीमतें तीन गुना बढ़ गईं।
  2. सरकार द्वारा टैक्स बढ़ाना: अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार ने टैक्स में लगातार बढ़ोतरी की, जिससे जनता में गुस्सा था। एनआरआई टैक्स स्लैब लागू होने से लगभग 20 लाख लोग सीधे प्रभावित हुए।
  3. ब्रेग्जिट का नुकसान: 2016 में ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला किया, जिससे कंपनियों के निवेश और पर्यटन पर असर पड़ा। नए नियमों के कारण कंपनियों का निवेश रुक गया।
  4. प्रवासियों की समस्या: प्रवासियों के मुद्दे ने हर चुनाव में जोर पकड़ा, लेकिन कंजर्वेटिव पार्टी ने प्रवासियों को रोकने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए।
  5. हाउसिंग की समस्या: ब्रिटेन में हाउसिंग की बड़ी समस्या रही, और चुनाव प्रचार के दौरान लेबर पार्टी ने एक लाख घर बनाने का वादा किया था।

ऋषि सुनक के हारने और कीर स्टार्मर के सत्ता में आने से भारत पर प्रभाव

ऋषि सुनक के भारतीय मूल के होने से भारत के लोगों का सिधा जुड़ाव उनसे था। सुनक हमेशा मंदिरों में पूजा – पाठ करते देखें जा सकते थे। पिछले 2 सालों में भारत और ब्रिटेन के रिश्ते बेहतर हूए है, भले ही फ्री ट्रेड एग्रीमेंट ब्रिटेन के साथ भारत साईन न कर पाया हो लेकिन कई बाईलेटरल वार्ता में महत्वपूर्ण स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप पर चर्चा हुई। कोरोना और उसके बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में मंदी के कारण भारत ब्रिटेन के साथ ट्रेड एग्रीमेंट साईन नहीं कर पाया।

बता दें कि जर्मी कोर्बिन के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने 2019 में अपने एनुअल इवेंट में एक प्रस्ताव पारित किया था। इस प्रस्ताव में घोषणा की गई थी कि कश्मीर में मानवीय संकट पैदा हो गया है, कोर्बिन के नेतृत्व में लाए गए इस प्रस्ताव में जोर दिया गया था कि कश्मीर को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया जाना चाहिए। भारत ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था. बाद में लेबर पार्टी में ये प्रस्ताव खारिज हो गया था। स्टार्मर की पॉलिसी लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन की नीतियों से काफी अलग है।

स्टार्मर ने चुनाव से ठीक पहले भारत के साथ स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप की बात भी की है। उन्होंने FTA और टेक्नोलॉजी, सिक्योरिटी, एजुकेशन और क्लाइमेट को लेकर दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिए जाने की बात कही हैं।

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