होली भी हुआ डिजिटल क्रांति का शिकार..

आज की पीढ़ी के अनुसार होली खेलने की नहीं, सिर्फ दिखाने की चीज है। इसमें लोगों की, रंगों की, पकवानों की जरूरत नहीं पड़ती। डिजिटल होली मनाने के लिए सबसे पहले उलटे हाथ से चुटकी भर हर्बल कलर लीजिए। अब अपने दोनों गालों पर लगाइए। अच्छा-सा मुंह बनाइए। अब अपने सीधे हाथ से मोबाइल से सेल्फी खीचिए। अब हैप्पी होली बाली लाइन के साथ वाट्सएप, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर स्टेटस अपलोड कर दीजिए। क्या कहा आपने कि बिना गुझिया, दहीबाड़े, कांजी के पानी के कैसी होली? ओके, रुकिए। गूगल इमेज से अपने मनचाहे पकवान की इमेज अपलोड करें। उसके नीचे लिखना न भूलें कि मम्मी के हाथ का टेस्टी यम्मी होली स्पेशल फूड। अब दोस्तों को वाट्सएप कर दीजिए। उधर से भी जवाब आए‌गा-यम्मी। सथ मैं जुबान लटकती स्माइली। मन गई न होली। अब भला क्या जरूरत है इतना कुछ बनाओ और बैठ कर प्लेट सजा कर लोगों का इंतजार करो। कुछ लोगों को डिजिटल होली के ढेरों फायदे दिखते हैं। पहले वे सिर्फ अपने मौहल्ले तक ही सीमित थे। आज इंस्टाग्राम, वाट्सएप एवं फेसबुक के युग में वे घर बैठे पूरी दुनिया संग इको फ्रेंडली के साथ- साथ पाकेट फ्रेंडली होली भी मनाते हैं। इसके लिए बस होली के तरह-तरह के मैसेज फारवर्ड करें। फेसबुक मित्रों की पोस्ट लाइक करें। उनके घिसे- पिटे जुमलों पर वाह-वाह करें। पकवानों की फोटो पर वेरी टेस्टी या यम्मी लिख रिप्लाई करें। रंग लगे चेहरों को नाइस बताएं। तो हुआ न- हल्दी लगे न फिटकरी और रंग चोखा ही चोखा।

यदि श्रीकृष्ण इस डिजिटल क्रांति के दौर में होते तो शायद बृज में होला… क्या होली भी न होती। गुलाल की फूलों की और यहां तक कि ल‌ट्ठमार होली 18। न ही होती गोपियों संग रासलीला, क्योंकि सब इस्टाग्राम, वाट्सएप एवं फेसबुक पर होली मना लेते। न गोकुल से बरसाना जाने की मेहनत करनी पड़ती, न गुलाल उड़ता और न लट्ठ की मार खानी पड़ती। क्या आप भी मित्रों को होली की बधाई के मैसेज के साथ मिठाई एवं रंग के फोटो भेजने की फिराक में हैं ? आपका इरादा भी हो तो, आप सभी को हमारे तरफ से हैप्पी होली।

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