चन्द्रयान-3 की सफलता हर भारतवासियों के लिए गौरव का क्षण

चंद्रमा पर चन्द्रयान-3 की लैंडिंग भारत के लिए स्मरणीय, अभूतपूर्व और अंतरिक्ष जगत में एक बड़ी उपलब्धि हैं। भारत अब पूरे दुनिया में पहला देश बन चुका है जिसने दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक लैंडिंग किया है और चन्द्रमा पर साफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बन चुका है। इससे पहले 1966 में तत्कालीन सोवियत संघ ने पहली बार चांद पर साफ्ट लैंडिंग कि थी, फिर अमेरिका ने 10 अगस्त 1966 में चांद पर पहुंचा तो वहीं चीन 1 दिसंबर 2013 में चांद पर पहुंचने में सफलता पाई। लेकिन सारे देशों ने भूमध्य रेखा के आसपास ही अपने लैंडर को उतारा क्योंकि यहां सूर्य की रौशनी ठीक तरिके से पहुंचती है जिससे लैंडिंग में उतनी ज्यादा समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता है। लेकिन भारत ने जिस तरिके से दक्षिणी ध्रुव जहां सूर्य की रौशनी ना मात्रा पहुंचती है वहां सफलतापूर्वक साफ्ट लैंडिंग करने में कामयाबी हासिल कर ली है।

दक्षिणी ध्रुव पर लैंडिंग करना क्यों मुश्किल है?
चांद का दक्षिणी ध्रुव करीब ढाई हजार किलोमीटर चौड़ा है और यह आठ किलोमीटर गहरे गड्ढे के किनारे स्थित है। यहाँ की जमीन ऊबड़-खाबड़ है, उल्का पिंड और दूसरे ग्रहों के टकराने से यहाँ की जमीनों में कई जगह बड़े – बड़े गड्ढे बने हुए हैं। यहाँ कई ऐसे क्षेत्र है जहां आजतक कभी सूर्य की रौशनी नहीं पहुंची जिसके कारण तापमान -250 डिग्री सेल्सियस रहती है। चांद के दक्षिणी ध्रुव को सौरमंडल का सबसे पुराना इंपैक्ट क्रेटर माना जाता है। इंपैक्ट क्रेटर से आशय किसी ग्रह या उपग्रह में हुए उन गड्ढों से है जो किसी बड़े उल्का पिंड या ग्रहों की टक्करों से बनता है।

23 अगस्त से 2 दिन पहले इसरो ने कहा था कि अगर स्थिति सामान्य नहीं होती है तो लैंडिंग अगले महीने तक टल सकती है, स्थिति सामान्य न होने का कारण है बड़ी मात्रा में धूल- मिट्टी, रौशनी की कमी।

चांद के दक्षिणी ध्रुव पर क्या है खास?
चांद का दक्षिणी ध्रुव जहां कई ऐसे रहस्यमई चीजें छूपी है जिसे खोजने के लिए दुनिया भर की स्पेश ऐजेंसीयों ने अपने कई स्पेश मिशन यहाँ भेजे लेकिन आजतक कोई सफल नहीं हो पाया लेकिन अब भारत के द्वारा दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक लैंडिंग के बाद उन रहस्यमई बिंदुओं का पता लगाया जा सकेगा जिसे आजतक कोई नहीं जान सका है।

कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में पता लगाया जाएगा
1. क्या चन्द्रमा पर पानी की मौजूदगी है?
1966 में अमेरिका के अपोलो मिशन ने जब चांद पर लैंडिंग कि तो स्पेश ऐजेंसी नाशा ने यह बताया कि चांद पर पानी नहीं है लेकिन वहीं 2008 में जब भारत चांद पर पहुँचा तो यह पता लगाया जा सका की चन्द्रमा पर पानी की मौजूदगी है लेकिन चन्द्रयान-1 चांद के सतह पर क्रैश लैंडिंग हो गया।

नाशा के शोध के अनुसार दक्षिणी ध्रुव पर जहां अरबों वर्षों से आजतक कभी सूर्य की रौशनी नहीं पहुंची वहां गहरे गड्ढे में बर्फ मौजूद हो सकते हैं।
अगर चांद पर पानी की मौजूदगी होती है तो उससे आक्सीजन बनाया जा सकता है फिर वहां जीवन भी हो सकती है साथ में उस पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन परमाणुओं में तोड़ा जा सकता है जिनका उपयोग रॉकेट प्रोपेलेंट्स (तरल रॉकेट ईंधन) के रूप में किया जा सकता है।

2. यूरोपीय स्पेस एजेंसी के साथ काम करने वाली ब्रिटेन की ओपन यूनिवर्सिटी की प्लेनेटरी साइंटिस्ट सिमोन बार्बर कहती हैं कि “हम इस तरह के सवालों के जवाब तलाश सकते हैं कि पानी कब आया, कहां से आया, और पृथ्वी पर जीवन के विकास के लिए इसके निहितार्थ क्या हैं.

3. चन्द्रमा के मिट्टी में क्या-क्या तत्व मौजूद है?

4. क्या कोई पदार्थ जो बहुत ही लाभकारी हो जिसका इस्तेमाल हम धरती पर कर सकते हैं?

5. सबसे खास बात यह पता लगाई जा सकेगी कि आखिर चांद का निर्माण कैसे हुआ, कब हुआ? क्या चांद पहले बर्फ का ही टुकड़ा था इत्यादि।

एक कहावत है कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती, भारत ने 22 अक्टूबर 2008 को अपना पहला चन्द्र मिशन चन्द्रयान-1 भेजा लेकिन जब वह चन्द्रमा की परिक्रमा कर रहा था उसी दौरान क्रैश हो गया। 22 जुलाई, 2019 को जब चन्द्रयान-2 को भेजा गया जो चांद के सतह के 6 किमी दूर क्रैश हो गया।
14 जुलाई, 2023 को लांच किया गया यह मिशन 23 जुलाई, 2023 को शाम 6:04 बजे सफलतापूर्वक चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड कर चुका है। यह उपलब्धि भारत के लिए ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए एक बड़ी कामयाबी है इससे सौरमंडल के पूराने इतिहासों के बारे में पता लगाया जाएगा।

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