फर्ज़ी ख़बरों के दौर में पत्रकारों का अनदेखियां दर्ज करना पहले से ज़्यादा ज़रूरी: जस्टिस चंद्रचूड़

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने मंगलवार को एक कार्यक्रम में दिए अपने संबोधन में कहा कि फर्जी खबरों और दुष्प्रचार के दौर में, हमें जरूरत है कि पत्रकार पहले से अधिक अनदेखी का दस्तावेजीकरण और हमारे समाज की खामियों को उजागर करें.

लाइव लॉ के मुताबिक, शीर्ष अदालत के जज ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के 11वें दीक्षांत और स्थापना समारोह को संबोधित कर रहे थे.

इस दौरान उन्होंने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि पत्रकारिता के पेशे में जाने वाले छात्र लोगों को उनकी आवाज बनकर सशक्त बना सकते हैं.

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य सूचना, मत और विचारों का प्रसार करना है ताकि लोग सही चयन और अपनी आजादी का प्रयोग कर सकें.

उन्होंने कहा, ‘जो पत्रकारिता के पेशे में जा रहे हैं, वे छात्रों और लोगों को उनकी आवाज बनकर सशक्त बना सकते हैं. पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य सूचना, मत और विचारों का प्रसार करना है ताकि लोग सही चयन और अपनी आजादी का प्रयोग कर सकें. सुप्रीम कोर्ट ने अर्णब रंजन गोस्वामी बनाम भारत संघ के अपने फैसले में कहा था कि भारत की स्वतंत्रता तब तक सुरक्षित रहेगी, जब तक पत्रकार बदले की कार्रवाई से डरे बिना सत्ता से सच कह सकते हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘फर्जी खबरों (फेक न्यूज) और दुष्प्रचार के इस दौर में, हमें चाहिए कि पत्रकार पहले से अधिक अनदेखियों का दस्तावेजीकरण करें और हमारे समाज की खामियों को उजागर करें.’

इस दौरान उन्होंने पत्रकारिता के अलावा अन्य पेशों में भविष्य बनाने जा रहे छात्रों को भी उनके पेशे से संबंधित कुछ बातें कहीं, साथ ही भारत की आजादी के 75वें साल पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज भी देश में ऐसे कई समुदाय हैं जिन्होंने लोकतंत्र क्या है ये नहीं मालूम.

उन्होंने कहा, ‘हमारे कई नागरिक सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में समानता से वंचित हैं.’

उन्होंने कहा कि डॉ. बीआर आंबेडकर ने हमें चेतावनी दी थी कि राजनीतिक लोकतंत्र की हमारी संरचनाएं तब तक जोखिम में हैं जब तक कि सामाजिक लोकतंत्र द्वारा उन्हें सहारा नहीं मिलता.

उन्होंने कहा कि आजादी के 75 वें वर्ष में हमें यह भी आत्मावलोकन करने की जरूरत है कि क्या महिलाओं को अपनी स्वतंत्रता का प्रभावी ढंग से उपयोग करने और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनने के पर्याप्त अवसर दिए गए हैं.

उन्होंने क़ानून के पेशे में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व का उदाहरण देते हुए कहा, ‘भारत सरकार के हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश के सभी वकीलों में महिला वकीलों की संख्या महज 15 फीसदी है.’

साथ ही कहा कि महिलाओं की स्वतंत्रता और क्षमताओं को बढ़ाने के लिए बनाए गए कानून भी अपर्याप्त और सीमित हैं.

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